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Showing posts from May, 2020

"नफरतिया हीरो और 28 गाँव की प्रधानी"

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बात पुरानी नहीं है, लेकिन हाँ उतनी नई भी नही है। बस हम सब जवान हो रहे थे , तब दिन्नू काका ये कहानी हम सबको सबक की तरह सुनाया करते थे। " लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई" , कहानी के बाद दिन्नू काका जोर देकर ये लाइन बोलते और समझाते हुए रुखसत होते। तो बात चल रही थी हमारे नफरतिया हीरो की। पास में ही एक गाँव हुआ करता था, नाम ठीक ठीक याद नहीं, वहीं रहता था नफरतिया। घर परिवार का ठीक ठीक कोई नहीं जानता था, कहते हैं कि कई साल पहले सबको छोड़ कर यहीं आ टपका था और फिर यहीं का हो गया। उसका असली नाम नरोत्तम रोगी था, लेकिन धीरे धीरे सारे इलाके में अब उसे नफरतिया हीरो नाम से ही जानते थे। जुबान का कच्चा था लेकिन बहुत वाचाल और हद से ज्यादा मीठा। दो घरों में झगड़ा लगाने में महारत हासिल थी उसे। सजने सँवरने का शौक था ही, एक कंघी दरवाजे पर तो दूसरी कमर में खोंसे रहता। मँहगे कपड़े और चमकता चेहरा, इन दो बातों का खास खयाल रखता था नफरतिया। इसी वजह से इलाके लोग उसे "हीरो" कहा करते थे। हालांकि कोई नहीं जानता था कि इस कपड़े, इस शानो शौकत के लिए पैसा कौन देता था और कहाँ से आता था?

एक_प्रेत_की_आत्मकथा : 2

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"क्या तुम हार गए?" "नहीं, तुम्हे ऐसा क्यूँ लगता है" " मुझे लगता नहीं, मैं जानती हूँ" " ओह... तो तुमने सदियों से चल रहे इस  युद्ध की हार का भार मेरे कंधों पर रख दिया है" " नहीं, वो बात नहीं है। तुम तो खून से लथपथ अभी भी मैदान में हो, लेकिन मैं चाहती हूँ तुम हार जाओ, वापस लौट जाओ, और अपने जख्मों को मरहम लगाओ। जिंदा रहना ही जीत है तुम्हारी" " लेकिन...  क्या मेरा हारना उन सभी प्रेमियों के युद्ध में हार जाने जैसा  नहीं होगा, जिन्होंने सभ्यता की शुरुआत से विद्रोह का झंडा थामा और हताहत होते रहे। मैं तो उनकी उम्मीद बन कर लड़ रहा हूँ। मैंने ये तलवार किसी मरते लहूलुहान जिस्म से ली थी, जो हार कर भागा नहीं था, जमीन पर गिरने तक लड़ा था।" " तो क्या चाहते हो? लड़ कर मरना या मर कर भी लड़ते रहना?" " मैंने जो चाहा वो एक सुनहरा ख्वाब था... लेकिन उसकी हकीकत बेहद डरावनी थी.. उसके लिए मैंने जो तलवार युद्ध में लहूलुहान किसी प्रेमी के हाथ से पकड़ी थी, अब जब मैं गिरूँगा तो मेरे हाथ से कोई और प्रेमी थामेगा। युद्ध जारी रह

ऑगस्ट लैंडमेसर: इश्क की ताकत और प्रतिरोध का साहस।

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ऑगस्ट लैंडमेसर: इश्क की ताकत और प्रतिरोध का साहस। इस तस्वीर को ध्यान से देखिए। कुछ घटनाएँ होती हैं जिन्हें समय दर्ज कर रहा होता है। चारों तरफ खड़े लोग नाजी सलाम कर रहे हैं और बीच में खड़ा है ऑगस्ट लैंडमेसर, बेपरवाह और बेधड़क अंदाज में। ये तस्वीर अपने आप में एक पूरी किताब है, पूरा बयान है कि जब आप अकेले हैं और सारी भीड़ दूसरी तरफ है, फिर भी सच सुनने और कहने का साहस खत्म नहीं होना चाहिए। यह एक कार्यक्रम की तस्वीर है जहाँ ऑगस्ट काम करता था। एक जहाज बनाने वाली कंपनी के नए जहाज की लांचिंग का कार्यक्रम। जब सब कर्मचारी नाजी सैल्यूट कर रहे हैं, वहाँ ठीक बीच में ऑगस्ट लैंडमेसर अपने बेखौफ अंदाज में सामान्य खड़ा है। जो हिटलर के जर्मनी को जानते हैं, उन्हें अंदाजा होगा की तत्कालीन जर्मनी में ये कितना बड़ा कदम होगा। करीबन पचपन साल बाद जब ये तस्वीर Die Zeit में छपी तो इसने सारी दुनिया में तहलका मचा दिया। यह अभूतपूर्व था कि कोई ऐसा भी था जो उस दौर में भी अपने विचार, अपनी मान्यता के साथ खड़ा था। वो भीड़ नहीं था, अकेला था लेकिन कई सौ साल बाद उसकी तस्वीर देखकर उसके जैसे हजारों लोग तैयार हो रहे थे।

"भारत में मार्क्स से पहले ज्योतिबा की जरूरत है"

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"भारतीय समाज में मार्क्स से पहले सैकड़ों हजारों ज्योतिबा की जरूरत है" वैश्विक संदर्भों में कई बार ये सवाल उठता है कि आखिर भारत में इतनी असमानता और गरीबी होने के बावजूद, ये तबका वर्ग संघर्ष की कसौटी पर एकजुट क्यों नहीं हो सका? इतनी बड़ी संख्या में मजदूर और गरीब आखिर अछूते क्यों रह गए, उनकी सांगठनिक शक्ति प्रबलता से सामने क्यूँ नहीं आई। इसका एक सीधा सा जवाब है भारतीय समाज की संरचना जो जातीय और लैंगिक असमानता से बहुत गहराई तक ग्रसित रही है। ऐसी परिस्थितियों में वर्ग के अंदर वर्ग का जो चक्रव्यूह था, उसे भेदना सिर्फ मार्क्सवाद से संभव ही नहीं था। यहाँ जातीय तौर पर बँटा समाज, स्त्री पुरुष असमानता में बँटा समाज इस परिकल्पना को समझने के लिए ना तब तैयार था और ना अब है। कल्पना कीजिए कि अट्ठारहवीं शताब्दी का वो समय, जब देश में गरीबी, अशिक्षा सम्पूर्ण देश में फैली हुई थी, उस समय भी एक इंसान था जो ये सोच रहा था कि समाज में सबको समानता का अधिकार होना चाहिए, स्त्री और पुरुष में भेद नहीं होना चाहिए। ये थे महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले। फूलों का कारोबार करने वाले माली परिवार में जन

इस देश में भी दो देश हैं.....

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इस देश में भी दो देश हैं। एक गरीब का और दूसरा अमीर का। दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। लॉकडाउन दोनो के लिए समस्या लेकर आया है। एक के पास खा कर "वॉक" करने की सहूलियत नहीं है तो दूसरे के पास खाने को ही नहीं है। और एक वो वर्ग है जिसमें हम हैं। इनसे एक दर्जा ऊपर, एक निश्चित आय वाले। यह वर्ग ही सबसे ज्यादा एहसानफरामोश है, क्रूर है, संवेदनहीन है। हमारा ही दिमाग जाति और धर्म के खेल खेलता है। हम एजेंडा के पहले रिसीवर हैं और पहले उग्र रिएक्टर भी। हमारे लिए देश के नाम पर वह सब जायज है जिससे हमारी चौखट तक आए बिना कुछ भी होता हो। दूसरी वजह है हमारा छद्म भ्रम। हम अपने देश की तकरीबन एक तिहाई जनसंख्या के खिलाफ हैं, उनकी समस्याओं से अनभिज्ञ हैं। उनकी भूख हमें व्याकुल नहीं करती, हमें धर्म ज्यादा खतरे में लगता है। ये भ्रम है कि आग हम तक नहीं आएगी, हम तो आग लगाने वाले लोग हैं। लेकिन जहर जब बह निकलता है तो वह अपना पराया नहीं देखता। हम 10 खाने के पैकेट बाँट कर फोटो खींच लेते हैं, हमारा अहम तुष्ट हो जाता है। हम साबित कर लेते हैं कि हम माँगने की नहीं, देने की स्थिति में हैं।। ये भले बुरा ल